Saturday, February 14, 2009

जन्नत



सूरज की किरण छायी है हर ओर हरियाली
धीमी हवा हो; कलियों में लहराती हो तुम
सूरज डूबे; दिन ढले; पूनम रात हो जाए काली
चाँद से चांदनी जो चुराती हो तुम।
आसमान के तारों से हूँ मै सहमत
तू है बड़ी नटखट, तू ही मेरी जन्नत!


तेरे आंखों के सागर का नाविक हूँ मैं
छुपा ले तू मुझे अपने पलकों में
कही नज़र न आऊँ तेरे नैनों में मैं
लगे न नज़र; काटूँ वहीं हर पल को मैं।
इस सागर में मेरे सपनों के जहाज़ को रोक मत
तू है बड़ी नटखट, तू ही मेरी जन्नत!


झाँक के देख मेरे दिल में एक बार
चाँद की सजी महफिल में तू नाचती मोर
चाहे मेरे दिल के तू कर दे टुकड़े हज़ार
आइना है ये! भिखरेगी तू हर ओर।
जग के पवित्र प्रेम की तू है मूरत
तू है बड़ी नटखट; तू ही मेरी जन्नत!


चाहे वक्त हमारे बीच बढ़ा दे दूरी
लहरों को सागर से अलग क्या कर सकता कोई?
कभी हाँ कभी ना - कहती रहे मन ये तेरी
मान भी ले; पूरी हो तेरी हर तमन्ना सोई।
मन कहे मेरा बंद कर तू अपनी ये शरारत
तू है बड़ी नटखट; तू ही मेरी जन्नत!

(रचना: १४/०२/०९ )
वि सू : यह रचना मात्र काल्पनिक है और किसी से कोई सम्बन्ध नही है
यदि किसी के साथ समानता होती है तो इसे मात्र एक संयोग कहा जायेगा!!!

1 comment:

avinash.bhangari said...

abba devru yarann kalpane madkondi e kavite barde antanu kelagade baribeku sir:):) anyways its really good i enjoyed lot.