सन्नाटा
लड़ - झगडके क्या करेगा हासिल,
क्या है दुश्मन ये सारा संसार?
है ज़िन्दगी चार दिन की,
खूब लुटा दे अपना प्यार!
सौ काँटों में बसा है एक गुलाब
इस खूबसूरती का एहसास दिला दिया
इस चीखती हुई सन्नाटे ने
आखिर कितना कुछ सिखा दिया!
कितनों को है ताने मारे,
लुभाया है तू कितनों को
कुछ ऐसे भी मोड़ थे जब
रुलाया तूने अपनों को
हर डगर पर थे साथ तेरे
राह का पत्थर हटा दिया
इस चीखती हुई सन्नाटे ने
आखिर कितना कुछ सिखा दिया!
हुआ है आज ये एहसास
तू तो हरदम साथ था मेरे
मन तू मेरा! हूँ तो मै अकेला
पर सब है आज साथ मेरे!
सुन रहा हूँ हर वो आवाज़
शहर के शोर को जो तूने दबा दिया
इस चीखती हुई सन्नाटे ने
हुआ है आज ये एहसास
तू तो हरदम साथ था मेरे
मन तू मेरा! हूँ तो मै अकेला
पर सब है आज साथ मेरे!
सुन रहा हूँ हर वो आवाज़
शहर के शोर को जो तूने दबा दिया
इस चीखती हुई सन्नाटे ने
आखिर कितना कुछ सिखा दिया!
1 comment:
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